BABA'S STORY

By Deeksha Nagar
BABA

In the winter of 1920s, a teenage boy named Sanchit ran away from his village in Basti district of Uttar Pradesh. Sanchit belonged to a family of prosperous farmers. His grandfather owned land and Sanchit was his only grandson. But Sanchit got weary of the domestic quarrels around money and property around him. He was an introvert. He spent a lot of time reflecting alone about the meaning and purpose of life. He wondered what money was good for if people didn’t know how-to live-in peace. He questioned the double standards by which adults led their lives--why even the strongest lacked the courage to stand up for their beliefs and show grit for what was right. Why was there no justice and equality? Why did people give in so readily to social pressures instead of taking action? Disillusioned, Sanchit decided to renounce the life around him in quest of a better world.

After many weeks of careful thought and planning, Sanchit ran away from his farmhouse. He had closely observed the routines of holy men who stopped by his village. He had noticed that they generally carried five essential items in their gear-- a small sack with a lota (metal pot), dori (a rope), lathi (staff), and roti (bread). He once told me that this was the basic camping gear you needed for long distance traveling--because in those days if you had lota and dori you could get water from the well to drink and to clean up, the staff was good for protection and to walk in the dark after night fall, and yes, you did need bread until you found some food at your next stop.
After saving bread from his dinner for two nights in a row, he left his aunt’s house in the wee hours of the morning. It was winter, he knew his bread would not spoil in the cool weather, and the sun would not come up until late. It was dark all around him, but his heart was light. He was leaving home in search of a better world.
After many adventures, which ranged from delivering groceries and carrying sacks in granaries, working as cook’s “boy-assistant” at a Gurukul, he came to Lucknow and found refuge at the office of Congress Party. Sanchit traveled with freedom fighters and helped them organize rallies. He recalled using his many skills and traits such as powering microphones and electricity through car batteries during Jawaharlal Nehru’s political rallies and cooking and serving meals for party workers who visited the office.
On January 5th, 1938, when my father, Sharad, was about 2 1/2 months old, Sanchit was introduced to my grandfather, Amritlal, who then at the age of 21, was about to publish a magazine called, “Chakkallas,” and was looking for an energetic “despatch” boy to run errands. This magazine was being edited by three oung progressive writers from Lucknow, namely Narrottam Nagar, Amritlal Nagar, Ram Bilas Sharma under the auspices of Suryakant Tripathi, Nirala. The office was located at Amritlal Nagar’s house in Chowk. Over the years he bonded with Amritlal Nagar’s family and remained with his family for the rest of his life.
I knew Sanchit as my Baba (Grandfather). He must have been in his late fifties or early sixties when I was a child. When he shared his story with me, he said, “Even though I did not find a better world, I surely found hope and love in people who were compassionate and caring, whose hearts were pure and simple, and who were strong and fearless because they believed in humanity.
Baba did not receive any financial benefits or pension from the government of India for his contribution as a “freedom fighter.” Before Sanchit Baba passed away in 1996, he transferred his meagre savings of Rs. 13,000-- (approximately $175.00) in the names of Richa and Deeksha--the grand-daughters of Amritlal Nagar. Sanchit Smriti Trust was founded under the guidance of Dr. Sharad Nagar, whom Sanchit Baba raised so that we can take his values forward and contribute to the creation of a better and more peaceful world.

बेमिसाल बाः प्रतिभा नागर

आलेख: दीक्षा नागर
सहयोग: विभा नागर ऋचा नागर
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बा को जब हम याद करते हैं, तो सबसे पहले हमें याद आती है उनकी खुशबू-- मघई पान के पत्तों में लिपटी जाफ़रानी पत्ती और बा की अपनी खुशबू में सराबोर --बा की नरमाहट, गरमाहट और मन को ठंडक देने वाली उनकी खास महक।
सामने से गुजरती हैं बा अपनी लाल छींट वाली धोती में, जिसमें आज भी लगे हैं कत्थे के दाग, जिसे आज भी सूंघने पर, या कहूं महज सूंघने की कल्पना करने पर--आ जाती है याद, बा के सुर में, शब्दो में गूंजते ढेर सारे किस्से--कुछ अपने कुछ जग के।
हमारी दादी, जिन्हें ससुराल से सावित्री की जगह प्रतिभा का नाम मिला, उन्हें लखनऊ में लोग या तो बा कहते, या बाजी और वास्तव में जिन्दगी भर, बा ने जिस-जिस का हाथ थामा, उसे एक माँ और बहन का आत्मीय रिश्ता दिया--चाहे वह व्यक्ति उनसे बड़ा हो या छोटा, गरीब हो या अमीर उसकी कहानियों और उसके मनोभावों उसके दुख और सुख से हमेशा वास्ता रखा। मुझे याद है एक बार हमारे सिटी मान्टेसरी स्कूल की आयाजी, जो इंटरवल में कंपट बेचती थी, वे हिचकियों से रोती हुई हमारे घर आयी उन पर किसी ने चोरी का झूठा आरोप लगा दिया था जिसकी वजह से स्कूल की प्रधानाचार्या ने उन्हें निकाल दिया था। बा ने आयाजी के प्रति हुये अन्याय के विरोध में तुरंत स्कूल के संस्थापक जगदीश और भारती गांधी के नाम एक पत्र लिखा, और हमारी आयाजी को रिक्शे के पैसे देकर, उन्हें स्कूल के हेडआफिस भेज दिया। बा के पत्र के प्रभाव से हमारी उस प्रिय आया की नौकरी फिर से बहाल हुई।
जब हम अपने बचपन को याद करते हैं तो याद आती है बा से मिलने वाली महिलाओं का ताँता। उनमें अनेक गरीब तबके की वे महिलायें थी जिन्हें सन 1949-51 के दौर में बा ने अपने घर पर, ‘कस्तूरबा बाल मंदिर’ के नाम से संचालित निशुल्क विद्यालय में पढ़ाया था।
सन् 1950 के दशक में जब हमारे दादाजी, अमृतलाल नागर ने "ये कोठेवालियाँ" रिपोर्ताज लिखना शुरू किया, तब बा की ही मदद से उन्होंने तवायफों से पहला सम्पर्क साधा। आजादी के बाद वेश्या उन्मूलन कानून लागू हो जाने के बाद, पुराने लखनऊ की तवायफों के घर में बेरोजगारी की वजह से फाके पड़ने लगे। समाज में उन्हें और उनके परिवार के लोगों को रोजगार देने या उनके दर्द को पूछने वाला कोई नहीं था। उस समय बा ने उन्हें समाज से जोड़ने की नायाब पहल की। सन् 1953 में उन्होंने निजी स्तर पर ‘महिला उद्योग केन्द्र’ नाम की संस्था क़ायम की जिसके माध्यम से उन्होंने तवायफों और उनके बच्चों को पढ़ाने और सिलाई-कढ़ाई सिखाने का काम शुरू किया। जल्द ही बा के साथ पुराने लखनऊ की अन्य संभ्रांत महिलाएं भी जुड़ गयीं और उनकी मदद से भूतपूर्व तवायफों और उनके बच्चों को एक नया जीवन जीने का ज़़रिया मिला।
बा ने निर्धन कन्याओं के विवाह में भी खासा योगदान दिया। बा दहेज विरोधी थी, उनकी अपनी बिरादरी में दहेज नहीं चलता था। मगर विवाह से जुड़ी तमाम खर्चे जो लड़की वालों पर बोझ बन जाते हैं उसकी समस्या को वे अच्छी तरह समझती थी। सहालग से पहले बा के पास अक्सर मेहनत मजूरी करने वाले गरीब तबके के लोग मदद मांगने आते, बा और हमारे लेखक दादाजी, जिन्होंने आर्थिक तंगी और ग़ुरबत के बहुत कठिन दिन देखे थे, गरीबी को अच्छी तरह समझते थे। बा उन गरीब परिवारों के सदस्यों के साथ, भरी दोपहरी में चौक के सम्पन्न परिवारों के घर-घर जाकर --अपनी निर्धन बेटियों के विवाह के लिए चंदे इकट्ठे करतीं।
हमने अपने जीवन काल में बा को कभी निष्क्रिय नहीं बैठे देखा। जब वह शान्तरूप से बैठती, तब भी, उनका मन, परिवारिक सामाजिक चिंताओं और कामों के जाल में उलझा रहता। चाहे वह घर के लोग हों, या बाहर के हों--बा से जो कोई अपनी चिन्ता कहता, वह चिन्ता बा की चिन्ता बन जाती। बा का सौंदर्य, उनके अन्दर का तेज था। माथे के बीच उनकी सिंदूरी टिकुली और उनके पान रंजित होठ ही उनके एक मात्र सिंगार थे। मगर तमाम लोग की मदद करने और उनकी कहानियां सुनने के बावजूद बहुत कम लोग, बा की अपनी कहानी से वाकिफ हैं।
हमारे दादाजी, (अमृतलाल नागरजी) बा को 75 प्रतिशत अमृतलाल नागर कहते थे। 28 मई 1985 को बा की अंतिम यात्रा से पहले वह शिवानीजी से बोले-- ‘मैं अपनी कलम तोड़ दूंगा। मेरी प्रतिभा चली गयी’। वास्तव में अमृतलाल नागर के साहित्य में, जितने भी विचारशील, संघर्ष रत, और नारीवादी विचारधारा से जुड़े प्रगतिशील पत्र हैं, उनकी प्रेरणा का स्रोत बा ही रही हैं।
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बा का जन्म 7 अप्रैल 1918 को गोकुलपुरा, आगरा में हुआ। बा के पिता शम्भुनाथ व्यास का 18 साल की उम्र में, बा के जनम से 16 दिन पहले, निधन हो गया था। बा को आजीवन इस बात का गहरा अवसाद रहा कि उन्हें पिता का प्यार नहीं मिला। बा का बचपन दो बड़े ही अलग स्वाभाव वाली महिलाओं के बीच में बीता। बा बताती थी कि जहाँ उनकी विधवा माँ जानकी बाई, सौम्य स्वभाव वाली सहृदय एवं मितभाषी महिला थी, वही उनकी विधवा निःसंतान दादी, कृष्णाबाई व्यास, जिन्होंने बा के पिताजी को गोद लिया था, अपने जमाने की दबंग महिलाओं में से एक थी। ससुराल की जमा पूंजी को सहेजते हुए, उन्होंने मोहल्ले में कुछ और मकान खरीद लिए थे-- कुछ उनके किराये से, और कुछ लोगों को ब्याज पर रूपये देकर वह अपने परिवार का भरण-पोषण करती थी। स्वाभिमान और स्वावलम्बन के गुण बा को अपनी माँ और दादी से विरासत में मिले।
कृष्णा बाई व्यास, हर मायने में निर्भीक थी। बा के पिताजी के देहांत पर, जब जात बिरादरी के लोगों ने उनसे विधवा बहू के बाल मुंडाने की बात कही, तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया--‘तुम्हें हमें बिरादरी से बाहर करना है, तो कर दो, मगर मेरी बहू बाल नहीं कटायेगी’।
तीज त्योहारों में भी बदलाव लाने की पहले बा के परिवार से हुई। मसलन, उस जमाने में अहोई अष्टमी का त्योहार केवल पुत्रवती महिलाएं ही मनाती थी, मगर नागर समाज में, लड़कियों के लिये, अहोई अष्टमी का व्रत रखने की परम्परा, बा की दादी और माँ ने आरम्भ की।
ऐसे माहौल से निकल कर जब हमारी बा, सन् 1940 के दशक में, दादाजी का साथ देने मुम्बई और चेन्नई पहुंची और वनिता समाज, मैरी स्टोप्स क्लीनिक जैसी संस्थाओं के सम्पर्क में आयीं और गांधी दर्शन के प्रति उनका लगाव बढ़ा तो उनकी नारीवादी दृष्टि साहित्य और सांस्कृतिक चेतना को एक नयी दृष्टि मिली।
सन् 1948 में जब हमारे दादाजी, फिल्मोद्योग छोड़कर लखनऊ वापस आये, तब बा ने बहू का चोला उतार कर--एक माँ और बहन के रूप में जन सामान्य से नया रिश्ता कायम किया। उस समय चौक में संभ्रांत परिवारों की महिलाएं, बिना चादर के घर से नहीं निकलती थी। लेकिन बा ने चादर ओढ़ना छोड़कर समाज को यह दिखाया कि संभ्रांत महिलाओं की पहचान चादर से नहीं, समाजिक कामों से होती है।
इसी तरह बा, परिवार नियोजन की भी पक्षधर थी। सन् 1940 में, मुम्बई में उन्होंने मैरी स्टोप्स क्लीनिक के माध्यम से परिवार नियोजन की जानकारी हासिल की। वैवाहिक संबंधों में हो रहे, यौनिक शोषण की समस्या से बा अच्छी तरह वाकिफ थी। वह अपने से छोटी हर विवाहित बहू, बेटी को सीमित परिवार और अपने शारीरिक फैसले खुद करने के लिये प्रेरित करती।
बा के देहांत के समय हम दोनों बहनें ऋचा और दीक्षा क्रमशः 16 और 14 वर्ष के थे। लेकिन हमें एक भी ऐसा मौका याद नहीं आता जब बा ने हमारे सामने जिंदगी से जुड़ी किसी सच्चाई को छिपाया हो। हमारे हर सवाल का जवाब उन्होंने ईमानदारी और बेबाकी से दिया। अक्सर बा जब हर प्रकार के प्रसंगो का खुले आम विवेचन करने लगती, तब आस-पास बैठी प्रौढ़ महिलायें कहती, “बा धीरे बोलिये, सामने बच्चियाँ बैठीं हैं। आप उनके सामने कैसी बातेें कर रही हैं?” बा कहती--“आज नहीं तो कल, ये बातें तो इन्हें देखनी-सुननी ही पड़ेगी। लड़कियों को तो यह सब मालुम होना ही चाहिये।” सच में, जिस बा ने हमें जिंदगी और समाज की तमाम सच्चाईयों से परिचित कराया और बा और बाजी ब़न हमें रास्ता दिखाया। उस बा की शख्सियत, हिम्मत और दोस्ती को हमारा बार-बार सलाम।
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